Thursday, August 26, 2010

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SURYA KAVACH
सूर्यकवचम्

किं छत्रं किंनु तिलकमुत तथा कुंडलं कौस्तुभो वा
चक्रं वा वारिजं वेत्यमरयुवतिभिर्यद्वलिद्वेषिदेहे ।
ऊर्ध्व मौलौ ललाटे श्रवसि ह्रदि करे नाभिदेशे च दृष्टं
पायात्तद्वोऽर्कबिम्ब स च दनुजरिपुर्वर्धमान: क्रमेण ॥
श्रीगणेशाय नाम: ॥
श्रीसुर्य उवाच । सांब सांब महाबाहो श्रृणृ मे कवचं शुभम् ।
त्रैलोक्यमंगलं नाम कवचं परमाद्‍भुतम् ॥१॥
यज्ज्ञात्वा मंत्रवित्सम्यक् फलं प्राप्नोति निश्‍चितम्‍ ।
यद्‍धृत्वा च महादेवो गणानामधिपोऽभवत् ॥२॥
पठनाध्दारणादिष्णु: सर्वेषां पालक: सदा ।
एकमिन्द्रादय:सर्व सर्वैश्‍वर्यमवाप्नुयु : ॥३॥
कवचस्य ऋषिर्ब्रह्मा छंदोऽनुष्टुबुदाहृत: ।
श्रीसुर्यो देवता चात्र सर्व देवनमस्कृत: ॥४॥
यश आरोग्यमोक्षेषु विनियोग: प्रकीर्तित: ।
प्रणवो मे शिर: पातु घृणिर्मे पातु भालकम् ॥५॥
सुर्योऽव्यान्नयनद्वंद्व मादित्य: कर्णयुग्मकम्‍ ।
अष्टाक्षरो महामंत्र : सर्वाभीष्टफलप्रद: ॥६॥
ह्रीं बीजें मे मुखं पातु हृदयं भुवनेश्‍वरी ।
चन्द्रबिंबं विंशदाद्यं पातु मे गुह्यदेशकम् ॥७॥
अंक्षरोऽसौ महामन्त्र: सर्वतन्त्रेषु गोपित: ।
शिवो वह्रिसमायुक्तो वामाक्षीबिंदुभूषित : ॥८॥
एकाक्षरो महामन्त्र: श्रीसुर्यस्य प्रकीर्तित: ।
गुह्याद्‍गुह्यतरो मन्त्रो वांछाचिंतामणि: स्मृत: ॥९॥
शीर्षादिपादपर्यंतं सदा पातु मनूत्तम: ।
इति ते कथितं दिव्य त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥१०॥
श्रीप्रदं कांतिदं नित्यं धनारोग्यविवर्धनम् ।
कुष्ठादिरोगशमनं महाव्याविनाशनम् ॥११॥
त्रिसंध्यं य: पठोन्नित्यमरोगी बलवान् भवेत् ।
बहुना किमिहोक्तेन यद्यन्मनसि वर्तते ॥१२॥
तत्तत्सर्व भवेत्तस्य कवचस्य च धारणात् ।
भूतप्रेतपिशाचाश्‍च यक्षगंधर्वराक्षसा: ॥१३॥
ब्रह्मराक्षसवेताला न द्रष्टुमपि तं क्षमा: ।
दुरादेव पलायंते तस्य संकीर्तनादपि ॥१४॥
भुर्जपत्रे समालिख्य रोचनागुरुकुंकुमै: ।
रविवारे च संक्रांत्यां सप्तम्यां च विशेषत: ॥१५॥
धारयेत्साधकश्रेष्ठ: श्रीसूर्यस्य प्रियो भवेत् ।
त्रिलौहमध्यगं कृत्वा धारयेत्साद्दक्षिणे करे ॥१६॥
शिखायामथवा कंठे सोऽपि सूर्यो न संशय: ।
इति ते कथितं सांब त्रैलोक्यमंगलाभिधम् ॥१७॥
कवचं दुर्लभं लोके तव स्नेहात्प्रकाशितम् ।
अज्ञात्वा कवचं दिव्यं यो जपेत्सूर्यमुत्तमम् ॥१८॥
सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ॥१९॥
इति श्रीब्रह्मयामले त्रैलोक्यमंगलं नाम सूर्यकवचं संपूर्णम् ।

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SRI DURGA KAVACH
श्री दुर्गा कवच

ऋषि मार्कंड़य ने पूछा जभी !
दया करके ब्रह्माजी बोले तभी !!
के जो गुप्त मंत्र है संसार में !
हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में !!
हर इक का कर सकता जो उपकार है !
जिसे जपने से बेडा ही पर है !!
पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का !
जो हर काम पूरे करे सवाली का !!
सुनो मार्कंड़य मैं समझाता हूँ !
मैं नवदुर्गा के नाम बतलाता हूँ !!
कवच की मैं सुन्दर चोपाई बना !
जो अत्यंत हैं गुप्त देयुं बता !!
नव दुर्गा का कवच यह, पढे जो मन चित लाये !
उस पे किसी प्रकार का, कभी कष्ट न आये !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
पहली शैलपुत्री कहलावे !
दूसरी ब्रह्मचरिणी मन भावे !!
तीसरी चंद्रघंटा शुभ नाम !
चौथी कुश्मांड़ा सुखधाम !!
पांचवी देवी अस्कंद माता !
छटी कात्यायनी विख्याता !!
सातवी कालरात्रि महामाया !
आठवी महागौरी जग जाया !!
नौवी सिद्धिरात्रि जग जाने !
नव दुर्गा के नाम बखाने !!
महासंकट में बन में रण में !
रुप होई उपजे निज तन में !!
महाविपत्ति में व्योवहार में !
मान चाहे जो राज दरबार में !!
शक्ति कवच को सुने सुनाये !
मन कामना सिद्धी नर पाए !!
चामुंडा है प्रेत पर, वैष्णवी गरुड़ सवार !
बैल चढी महेश्वरी, हाथ लिए हथियार !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
हंस सवारी वारही की !
मोर चढी दुर्गा कुमारी !!
लक्ष्मी देवी कमल असीना !
ब्रह्मी हंस चढी ले वीणा !!
ईश्वरी सदा बैल सवारी !
भक्तन की करती रखवारी !!
शंख चक्र शक्ति त्रिशुला !
हल मूसल कर कमल के फ़ूला !!
दैत्य नाश करने के कारन !
रुप अनेक किन्हें धारण !!
बार बार मैं सीस नवाऊं !
जगदम्बे के गुण को गाऊँ !!
कष्ट निवारण बलशाली माँ !
दुष्ट संहारण महाकाली माँ !!
कोटी कोटी माता प्रणाम !
पूरण की जो मेरे काम !!
दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ !
चमन की रक्षा को सदा, सिंह चढी माँ आओ !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
अग्नि से अग्नि देवता !
पूरब दिशा में येंदरी !!
दक्षिण में वाराही मेरी !
नैविधी में खडग धारिणी !!
वायु से माँ मृग वाहिनी !
पश्चिम में देवी वारुणी !!
उत्तर में माँ कौमारी जी!
ईशान में शूल धारिणी !!
ब्रहामानी माता अर्श पर !
माँ वैष्णवी इस फर्श पर !!
चामुंडा दसों दिशाओं में, हर कष्ट तुम मेरा हरो !
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
सन्मुख मेरे देवी जया !
पाछे हो माता विजैया !!
अजीता खड़ी बाएं मेरे !
अपराजिता दायें मेरे !!
नवज्योतिनी माँ शिवांगी !
माँ उमा देवी सिर की ही !!
मालाधारी ललाट की, और भ्रुकुटी कि यशर्वथिनी !
भ्रुकुटी के मध्य त्रेनेत्रायम् घंटा दोनो नासिका !!
काली कपोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी !
नासिका में अंश अपना, माँ सुगंधा तुम धरो !!
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
ऊपर वाणी के होठों की !
माँ चन्द्रकी अमृत करी !!
जीभा की माता सरस्वती !
दांतों की कुमारी सती !!
इस कुंठ की माँ चंदिका !
और चित्रघंटा घंटी की !!
कामाक्षी माँ ढ़ोढ़ी की !
माँ मंगला इस बनी की !!
ग्रीवा की भद्रकाली माँ !
रक्षा करे बलशाली माँ !!
दोनो भुजाओं की मेरे, रक्षा करे धनु धारनी !
दो हाथों के सब अंगों की, रक्षा करे जग तारनी !!
शुलेश्वरी, कुलेश्वरी, महादेवी शोक विनाशानी !
जंघा स्तनों और कन्धों की, रक्षा करे जग वासिनी !!
हृदय उदार और नाभि की, कटी भाग के सब अंग की !
गुम्हेश्वरी माँ पूतना, जग जननी श्यामा रंग की !!
घुटनों जन्घाओं की करे, रक्षा वो विंध्यवासिनी !
टकखनों व पावों की करे, रक्षा वो शिव कि दासनी !!
रक्त मांस और हड्डियों से, जो बना शारीर !
आतों और पित वात में, भरा अग्न और नीर !!
बल बुद्धि अंहकार और, प्राण ओ पाप समान !
सत रज तम के गुणों में, फँसी है यह जान !!
धार अनेकों रुप ही, रक्षा करियो आन !
तेरी कृपा से ही माँ, चमन का है कल्याण !!
आयु यश और कीर्ति धन, सम्पति परिवार !
ब्रह्मणी और लक्ष्मी, पार्वती जग तार !!
विद्या दे माँ सरस्वती, सब सुखों की मूल !
दुष्टों से रक्षा करो, हाथ लिए त्रिशूल !!
भैरवी मेरी भार्या की, रक्षा करो हमेश !
मान राज दरबार में, देवें सदा नरेश !!
यात्रा में दुःख कोई न, मेरे सिर पर आये !
कवच तुम्हारा हर जगह, मेरी करे सहाए !!
है जग जननी कर दया, इतना दो वरदान !
लिखा तुम्हारा कवच यह, पढे जो निश्चय मान !!
मन वांछित फल पाए वो, मंगल मोड़ बसाए !
कवच तुम्हारा पढ़ते ही, नवनिधि घर आये !!
ब्रह्माजी बोले सुनो मार्कंड़य !
यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया !!
रहा आज तक था गुप्त भेद सारा !
जगत की भलाई को मैंने बताया !!
सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित !
है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया !!
चमन जिसने श्रद्धा से इसको पढ़ा जो !
सुना तो भी मुह माँगा वरदान पाया !!
जो संसार में अपने मंगल को चाहे !
तो हरदम कवच यही गाता चला जा !!
बियाबान जंगल दिशाओं दशों में !
तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा !!
तू जल में तू थल में तू अग्नि पवन में !
कवच पहन कर मुस्कुराता चला जा !!
निडर हो विचर मन जहाँ तेरा चाहे !
चमन पाव आगे बढ़ता चला जा !!
तेरा मान धन धान्य इससे बढेगा !
तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गए !!
यही मंत्र यन्त्र यही तंत्र तेरा !
यही तेरे सिर से हर संकट हटायें !!
यही भूत और प्रेत के भय का नाशक !
यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये !!
इसे निसदिन श्रद्धा से पढ़ कर !
जो चाहे तो मुह माँगा वरदान पाए !!
इस स्तुति के पथ से पहले कवच पढे !
कृपा से आधी भवानी की, बल और बुद्धि बढे !!
श्रद्धा से जपता रहे, जगदम्बे का नाम !
सुख भोगे संसार में, अंत मुक्ति सुखधाम !!
कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादाँ !
तेरे दर पर आ गिरा, करो मैया कल्याण !!
!! जय माता दी !!

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SRI NARAYAN KAVACH
श्री नारायण कवच

न्यास
न्यासः- सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा भगवान नारायण को नमस्कार करके नीचे लिखे प्रकार से न्यास करें।
अंगन्यासः
ॐ ॐ नमः — पादयोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुष्ठ — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों का स्पर्श करें) ।
ॐ नं नमः — जानुनोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुष्ठ — इन दोनों को मिलाकर दोनों घुटनों का स्पर्श करें )।
ॐ मों नमः — ऊर्वोः (दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुष्ठ — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों की जाँघ का स्पर्श करें)।
ॐ नां नमः — उदरे ( दाहिने हाथ की तर्जनी तथा अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर पेट का स्पर्श करें )
ॐ रां नमः — हृदि ( मध्यमा-अनामिका-तर्जनी से हृदय का स्पर्श करें )
ॐ यं नमः – उरसि ( मध्यमा- अनामिका-तर्जनी से छाती का स्पर्श करें )
ॐ णां नमः — मुखे ( तर्जनी – अँगुठे के संयोग से मुख का स्पर्श करें)
ॐ यं नमः — शिरसि ( तर्जनी -मध्यमा के संयोग से सिर का स्पर्श करें )

करन्यासः
ॐ ॐ नमः — दक्षिणतर्जन्याम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने तर्जनी के सिरे का स्पर्श करें )
ॐ नं नमः — दक्षिणमध्यमायाम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें )
ॐ मों नमः —दक्षिणानामिकायाम् ( दहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करें )
ॐ भं नमः — दक्षिणकनिष्ठिकायाम् (दाहिने अँगुठे से हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें )
ॐ गं नमः — वामकनिष्ठिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें)
ॐ वं नमः —-वामानिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाँथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करें )
ॐ तें नमः —-वाममध्यमायाम् ( बाँये अँगुठे से बाये हाथ की मध्यमा का ऊपरवाला पोर स्पर्श करें )
ॐ वां नमः —वामतर्जन्याम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की तर्जनी का ऊपरवाला पोर स्पर्श करें )
ॐ सुं नमः —-दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ दें नमः —–दक्षिणाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )
ॐ वां नमः —–वामाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये अँगुठे के ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ यं नमः ——वामाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )

विष्णुषडक्षरन्यासः
ॐ ॐ नमः ————हृदये ( तर्जनी – मध्यमा एवं अनामिका से हृदय का स्पर्श करें )
ॐ विं नमः ————- मूर्धनि ( तर्जनी मध्यमा के संयोग सिर का स्पर्श करें )
ॐ षं नमः —————भ्रुर्वोर्मध्ये ( तर्जनी-मध्यमा से दोनों भौंहों का स्पर्श करें)
ॐ णं नमः —————शिखायाम् ( अँगुठे से शिखा का स्पर्श करें )
ॐ वें नमः —————नेत्रयोः ( तर्जनी -मध्यमा से दोनों नेत्रों का स्पर्श करें )
ॐ नं नमः ————— सर्वसंधिषु ( तर्जनी – मध्यमा और अनामिका से शरीर के सभी जोड़ों — जैसे – कंधा, घुटना, कोहनी आदि का स्पर्श करें )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्राच्याम् (पूर्व की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् –आग्नेय्याम् ( अग्निकोण में चुटकी बजायें )
ॐ मः अस्त्राय फट् — दक्षिणस्याम् ( दक्षिण की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — नैऋत्ये (नैऋत्य कोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्रतीच्याम् ( पश्चिम की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — वायव्ये ( वायुकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — उदीच्याम् ( उत्तर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऐशान्याम् (ईशानकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऊर्ध्वायाम् ( ऊपर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — अधरायाम् (नीचे की ओर चुटकी बजाएँ )

।। श्री हरिः ।।
अथ श्रीनारायणकवच
राजोवाच
यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१।।
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२।।

राजा परिक्षित ने पूछा - भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरंगिणी सेना को खेल-खेल में - अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राजलक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।। १-२ ।।

श्रीशुक उवाच

वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः श्रुणु ।।३।।
विश्वरुप उवाच
धौताड़् घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः ।
कृतस्वांगकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ।।४ ।।
नारायणमयं वर्म संह्येद् भय आगते ।
पादयोर्जानुनोरुर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ।।५।।
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोकांरादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ।।६।।

श्रीशुकदेवजी ने कहाः परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।३
उपदेश किया। तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।३।।
विश्वरुप ने कहा - देवराज इन्द्र ! भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायणकवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए । उसकी विधि यह है कि पहले हाथ - पैर धोकर आचमन करें, फ़िर हाथ में कुशकी पवित्री धारण करके उत्तर मुहँ बैठ जाय. इसके बाद कवचधारणपर्यन्त और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से ' ॐ नमो नारायणाय ' और ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय '-इन मन्त्रों के द्वारा हृदयादि अंगन्यास तथा अंगुष्ठादि करन्यास करें । पहले 'ॐ नमो नारायणाय ' इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ आदि आठ अक्षरों का क्रमशः पैरो, घुटनों, जांघो, पेट हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिर में न्यास करें । अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के यकार से लेकर ॐ कारपर्यन्त आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ करके उन्हीं आठ अंगो में विपरीत क्रमसे न्यास करें। ।।४ -६ ।।

करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७।।
तदनन्तर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर -मन्त्र के ॐ आदि बारह अक्षरों का दायीं तर्जनी से बाँयीं तर्जनी तक दोनों हाँथ की आठ अँगुलियों और दोनों अँगुठों की दो-दो गाठों में न्यास करे।।७।।

न्यसेद् धृदय ओंकारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८।।

वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९।।
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०।।

फिर “ॐ विष्णवे नमः” इस मन्त्र के पहले के पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र , में ‘ष’ का भौहों के बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’ का दोनों नेत्रों और ‘न’ का शरीर की सब गाँठों में न्यास करे तदनन्तर ‘ॐ मः अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे इस प्रकर न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरूष मन्त्रमय हो जाता है ।।८-१०।।

आत्मानं परमं ध्यायेद् ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ।।११।।

इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान् का ध्यान करे और अपने को भी तद् रूप ही चिन्तन करे तत्पश्चात् विद्या, तेज, और तपः स्वरूप इस कवच का पाठ करे ।।११।।

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताड़् घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापपाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२।।

भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे ही ओंकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से मेरी रक्षा करें।।१२।।

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।१३।।

मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।१४।।

जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर गये थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें ।।१४।।

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।।१५।।

अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ।।१५।।

मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६।।

भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से मेरी रक्षा करें ।।१६।।

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७।।

परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ।।१७।।

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८।।

भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान् ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें ।।१८।।

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कलेः कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९।।

भगवान् श्रीकृष्णद्वेपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।१९।।

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसंगवमात्तवेणुः ।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०।।

प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।२०।।

देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।२१।।

तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।२१।।

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।२२।।

रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।२२।।

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।२३।।

सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये ) की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ।।२३।।

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।२४।।

कौमुद की गदा ! आपसे छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दिजिये ।।२४।।

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५।।

शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।२५।।

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चक्षूंषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ।।२६।।

भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दिजिये। भगवान् की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर दिजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।२६।।

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७।।

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।२८।।

सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायें ।।२७-२८।।

गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९।।

बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९।।

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धीन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०।।

श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।३०।।

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ।।३१।।

जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।३१।।

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।३२।।

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३।।

जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ।।३२-३३।।
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४।।
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें ।।३४

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५।।

देवराज इन्द्र ! मैने तुम्हें यह नारायण कवच सुना दिया है इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य – यूथपतियों को जीत कर लोगे ।।३५।।

एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।३६।।

इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरूष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता है अथवा पैर से छू देता है, तत्काल समस्त भयों से से मुक्त हो जाता है ।।३६।।

न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।३७।।

जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाच आदि और बाघ आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय नहीं होता ।।३७।।

इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८।।

देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरूभूमि में त्याग दिया ।।३८।।

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ।।३९।।

जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके उपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठ कर निकले ।।३९।।

गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ।।४०।।

वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें बालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देव की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गये ।।४०।।

।।श्रीशुक उवाच।।
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१।।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परिक्षित् जो पुरूष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है ।।४१।।

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ।।४२।।

परीक्षित् ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे ।।४२।।
।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।
( श्रीमद्भागवत स्कन्ध 6 , अ। 8 )

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SHRI KALIKA ASHTAKAM
।। श्रीकालिकाष्टकम् ।।

धयानम्
गलद् रक्तमण्डावलीकण्ठमाला महाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।
विवस्त्रा श्मशानलया मुक्तकेशी महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥
भजे वामयुग्मे शिरोsसिं दधाना वरं दक्षयुग्मेsभयं वै तथैव ।
सुमध्याsपि तुङ्गस्तनाभारनम्रा लसद् रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥
शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।
शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभि-श्चतुर्दिक्षशब्दायमानाsभिरेजे ॥३॥
स्तुति:
विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणांस्त्रीन् समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवु: ।
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥४॥
जगन्मोहनीयं तु वाग्वादिनीयं सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥५॥
इयं स्वर्गदात्री पुन: कल्पवल्ली मनोजांस्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥६॥
सुरापानमत्ता सभुक्तानुरक्ता लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।
जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥७॥
चिदान्दकन्दं हसन् मन्दमन्दं शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।
मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा:॥८॥
महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा कदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥९॥
क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं मया लोकमध्ये प्रकाशीकृत यत् ।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात् स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥१०॥
फलश्रुति:
यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्य-स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृह चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्ति: स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥११॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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SHRI SHEETLA ASHTAKAM
।।श्री शीतलाष्टकं ।।

श्री शीतलायै नमः

विनियोगः ॐ अस्य श्रीशीतलास्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीशीतला देवता, लक्ष्मी (श्री) बीजम्, भवानी शक्तिः, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगः ।।
ऋष्यादि-न्यासः- श्रीमहादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीशीतला देवतायै नमः हृदि, लक्ष्मी (श्री) बीजाय नमः गुह्ये, भवानी शक्तये नमः पादयो, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।।
ध्यानः
ध्यायामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम्।।
मानस-पूजनः
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
मन्त्रः
“ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः।।” (११ बार)
।।मूल-स्तोत्र।।
ईश्वर उवाच
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी-कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ।।१।।
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, सर्व-रोग-भयापहाम् ।
यामासाद्य निवर्तन्ते, विस्फोटक-भयं महत् ।।२।।
शीतले शीतले चेति, यो ब्रूयाद् दाह-पीडितः ।
विस्फोटक-भयं घोरं, क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ।।३।।
यस्त्वामुदक-मध्ये तु, ध्यात्वा पूजयते नरः ।
विस्फोटक-भयं घोरं, गृहे तस्य न जायते ।।४।।
शीतले ! ज्वर-दग्धस्य पूति-गन्ध-युतस्य च ।
प्रणष्ट-चक्षुषां पुंसां , त्वामाहुः जीवनौषधम् ।।५।।
शीतले ! तनुजान् रोगान्, नृणां हरसि दुस्त्यजान् ।
विस्फोटक-विदीर्णानां, त्वमेकाऽमृत-वर्षिणी ।।६।।
गल-गण्ड-ग्रहा-रोगा, ये चान्ये दारुणा नृणाम् ।
त्वदनुध्यान-मात्रेण, शीतले! यान्ति सङ्क्षयम् ।।७।।
न मन्त्रो नौषधं तस्य, पाप-रोगस्य विद्यते ।
त्वामेकां शीतले! धात्री, नान्यां पश्यामि देवताम् ।।८।।
।।फल-श्रुति।।
मृणाल-तन्तु-सदृशीं, नाभि-हृन्मध्य-संस्थिताम् ।
यस्त्वां चिन्तयते देवि ! तस्य मृत्युर्न जायते ।।९।।
अष्टकं शीतलादेव्या यो नरः प्रपठेत्सदा ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ।।१०।।
श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः ।
उपसर्गविनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ।।११
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता ।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ।।१२।।
रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाखनन्दनः ।
शीतलावाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ।।१३।।
एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् ।
तस्य गेहे शिशूनां च शीतलारुङ् न जायते ।।१४।।
शीतलाष्टकमेवेदं न देयं यस्यकस्यचित् ।
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धाभक्तियुताय वै ।।१५।।
।।इति श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

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SRI RUDRASTAKAM
श्रीरुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥1॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यानगोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकालकालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसदभालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥ऽ॥
कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥
न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दुखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विपेण हरतुष्टये ।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु प्रसीदति॥
इति श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं श्री रुद्राष्टकम् संपूर्ण ॥

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SURYASHTAKAM
सूर्याष्टकम्

श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीशिवप्रोक्तं सूर्याष्टकम् ॥
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर । दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥
सप्ताश्वरथमारुढ़ प्रचण्डं कश्यपात्मजम् । श्‍वेतपद्मधरं देवं तं सुर्यं प्रणमाम्यहम् ॥२॥
लोहितं रथमारुढं सर्वलोकपितामहम् । महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥३॥
त्रैगुण्यं च महाशुरं ब्रह्माविष्णुमहेश्‍वरम् । महापापहरं देव तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥४॥
बृंहितं तेज: पुञ्जं च वायुरामाकाशमेव च । प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥५॥
बंधूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् । एकचक्रधरं देवं तं सुर्यं प्रणमाम्यहम् ॥६॥
तं सुर्यं जगत्कर्तारं महातेज:प्रदीपनम् । महापापहरं देवं तं सुर्यं प्रणमाम्यहम् ॥७॥
तं सुर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् । महापापहरं देवं तं सुर्यं प्रणमाम्यहम् ॥८॥
इति श्रीशिवप्रोक्तं सुर्याष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।।

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SRI GAJENDRA MOKSHA
श्री गजेन्द्र मोक्ष

श्री शुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्धया समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥1॥
गजेन्द्र उवाच -
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥2॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्|
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्।।३।।
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्।
अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः।।४।।
कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु।
तमस्तदाऽऽसीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः।।५।।
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम्।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु।।६।।
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलं विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः।।७।।
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरुपे गुणदोष एव वा।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया यः तान्यनुकालमृच्छति।।८।।
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।
अरुपायोरुरुपाय नम आश्चर्यकर्मणे।।९।।
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि।।१०।।
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्विचता
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे।।११।।
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च।।१२।।
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः।।१३।।
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः।।१४।।
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय।
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय।।१५।।
गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागमस्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि।।१६।।
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीतप्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते।।१७।।
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैर्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय।।१८।।
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम्।।१९।।
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः।।२०।।
तमक्षरं ब्रह्म परं परेशमव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम्।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरमनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे।।२१।।
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः।
नामरुपविभेदेन फलव्या च कलया कृताः।।२२।।
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः।
तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः।।२३।।
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् निषेधशेषो जयतादशेषः।।२४।।
जिजीविषे नाहमिहामुया किमन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्।।२५।।
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्।।२६।।
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्।।२७।।
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेगशक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने।।२८।।
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम्।
तं दुरत्ययामाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम्।।२९।।
श्री शुक उवाच
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत्।।३०।।
तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमानश्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः।।३१।।
सोऽन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रान्नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते।।३२।।
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिमूमुचदुस्त्रियाणाम्।।३३।।

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SHIVPANCHAKSHAR STOTRAM
।। शिवपंचाक्षरस्तोत्रम्।।

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै 'न'काराय नमः शिवाय ।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै 'म'काराय नमः शिवाय।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै 'शि'काराय नमः शिवाय।
वशिष्ठकुम्भोभ्दवगौतमाय मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै 'व'काराय नमः शिवाय।
यक्षस्वरुपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै 'य'काराय नमः शिवाय।
पंचाक्षरमिदं पुण्य यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।

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KANAK DHARA STROTRAM
।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।।

अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।

मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

।। इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम ।।

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SHRI DWADASH JYOTIRLINGAM STROTRAM
श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम्

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् । भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ।। १।।
श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् । तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ।। २।।
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ।। ३।।
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय । सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ।। ४।।
पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ।। ५।।
याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः । सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ।। ६।।
महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः । सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ।। ७।।
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे । यद्धर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ।। ८।।
सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः । श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ।। ९।।
यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपदप्रसिद्दं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ।। १०।।
सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ।। ११।।
इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् । वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये ।। १२।।
ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ।।
।। इति द्वादश ज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं संपूर्णम् ।।

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DEV KRIT LAXMI STROTRAM
देवकृत लक्ष्मी स्तोत्रम्

क्षमस्व भगवंत्यव क्षमाशीले परात्परे । शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते ॥
उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते । त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम् ॥
सर्वसंपत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी । रासेश्वर्यधि देवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः ॥
कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका । स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले ॥
वैकुंठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती । गंगा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः ॥
कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम् । रासे रासेश्वरी त्वं च वृंदावन वने-वने ॥
कृष्णा प्रिया त्वं भांडीरे चंद्रा चंदनकानने । विरजा चंपकवने शतशृंगे च सुंदरी ॥
पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने । कुंददंती कुंदवने सुशीला केतकीवने ॥
कदंबमाला त्वं देवी कदंबकाननेऽपि च । राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीगृहे गृहे ॥
इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयो मनवस्तथा । रूरूदुर्नम्रवदनाः शुष्ककंठोष्ठ तालुकाः ॥
इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम् । यः पठेत्प्रातरूत्थाय स वै सर्वै लभेद् ध्रुवम् ॥
अभार्यो लभते भार्यां विनीतां सुसुतां सतीम् । सुशीलां सुंदरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम् ॥
पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वराम् । अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीविनम् ।
परमैश्वर्ययुक्तं च विद्यावंतं यशस्विनम् । भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् ॥
हतबंधुर्लभेद्बंधुं धनभ्रष्टो धनं लभेत् । कीर्तिहीनो लभेत्कीर्तिं प्रतिष्ठां च लभेद् ध्रुवम् ॥
सर्वमंगलदं स्तोत्रं शोकसंतापनाशनम् । हर्षानंदकरं शश्वद्धर्म मोक्षसुहृत्प्रदम् ॥॥
॥ इति श्रीदेवकृत लक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

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SURYA STROTRAM
सूर्यस्तोत्रम्

श्रीगणेशाय नम: ॥
याज्ञवल्क्य उवाच ।
श्रृणुष्व मुनिशार्दूल सुर्यस्य कवचं शुभम् । शरीरारोग्यदं दिव्यं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥१॥
देदीप्यमानमुकुटं स्फुरन्मकरकुंडलम् । ध्यात्वा सहस्त्रकिरणं स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ॥२॥
शिरो मे भास्कर: पातु ललाटं मेऽमितद्युति: । नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्‍वर: ॥३॥
घ्राणं घर्मघृणि: पातु वदनं वेदवाहन: । जिह्वां मे मानद: पातु कण्ठं मे सुरवंदित: ॥४॥
स्कंधौ प्रभाकर: पातु वक्ष: पातु जनप्रिय: । पातु पादौ व्दादशात्मा सर्वांगं सकलेश्‍वर: ॥५॥
सूर्यसक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्जपत्रके । दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्वसिद्धय: ॥६॥
सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योऽधीते स्वस्थमानस: । स रोगमुक्तो दीर्घायु: सुखं पुष्टिं च विंदति ॥७॥
इति श्रीमद्याज्ञवल्क्यविरचितं सूर्यकवचस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ।

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SHREE ANNAPOORNA STOTRA
श्री अन्नपूर्णास्तोत्रम्‌

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौंदर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिल-घोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी।
प्रालेयाचल-वंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपुर्णेश्वरी॥१॥

नानारत्न-विचित्र-भूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहार-विलम्बमान विलसद्वक्षोज-कुम्भान्तरी।
काश्मीराऽगुरुवासिता रुचिकरी काशीपुराधीश्वरी।
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥२॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्माऽर्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानल-भासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी।
सर्वैश्वर्य-समस्त वांछितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥३॥

कैलासाचल-कन्दरालयकरी गौरी उमा शंकरी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओंकारबीजाक्षरी।
मोक्षद्वार-कपाट-पाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥४॥

दृश्याऽदृश्य-प्रभूतवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपांकुरी।
श्री विश्वेशमन प्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥५॥

उर्वी सर्वजनेश्वरी भगवती माताऽन्नपूर्णेश्वरी
वेणीनील-समान-कुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी।
सर्वानन्दकरी दृशां शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥६॥

आदिक्षान्त-समस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरा त्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्यांकुरा शर्वरी।
कामाकांक्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥७॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुंदरी
वामस्वादु पयोधर-प्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी।
भक्ताऽभीष्टकरी दशाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥८॥

चर्न्द्रार्कानल कोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्नि समान-कुन्तलहरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी।
माला पुस्तक-पाश-सांगकुशधरी काशीपुराधीश्वरी
शिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥९॥

क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षरी सदा शिवंकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी।
भिक्षां देहि कृपावलंबनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी॥१०॥

अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे!।
ज्ञान वैराग्य-शिद्ध्‌यर्थं भिक्षां देहिं च पार्वति॥११॥

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्‌॥१२॥

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितम्‌ अन्नपूर्णास्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ॥

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SHIV TANDAV STOTRA
शिव तांडव स्त्रोतम्

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटाक्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌ ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

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ADITYA HRIDAYA STOTRA
आदित्यहृदयस्तोत्रम्

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥१॥
दैततैश्‍च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥२॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥३॥
आदित्यहृदयं पुण्यं. सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥४॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥५॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पुजयस्व विवस्वत्‍नं भास्करं भुवनेश्‍वरम् ॥६॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥७॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्‍च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यपां पतिः ॥८॥
पितरो वसव: साध्या अश्‍विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राणा ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥९॥
आदित्य: सविता सुर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥१०॥
हरिदश्‍व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥११॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥१२॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥१३॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्‍वो महातेजा: रक्त: सर्वभवोद् भव: ॥१४॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्‍वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥१५॥
नम: पुर्वाय गिरये पश्‍चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥१६॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्‍वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥१७॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पह्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥१८॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥१९॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥२०॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्‍वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥२१॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥२२॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥२३॥
देवाश्‍च क्रतवश्‍चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वषु परमप्रभु: ॥२४॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुष: कश्‍चिन्नावसीदति राघव ॥२५॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥२६॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥२७॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव: प्रयतात्मवान् ॥२८॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥२९॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् । सर्वयत्‍नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥३०॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥

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LAXMI STOTRAM
लक्ष्मीस्तोत्रम्.

जय पद्मपलाशाक्षि जय त्वं श्रीपतिप्रिये ।
जय मातर्महालक्ष्मि संसारार्णवतारिणि ।।1।।
महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ।।2।।
पद्ममालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे ।
सर्वभूतहितार्थाय वसुवृष्टिं सदा कुरु ।।3।।
जगन्मातर्नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ।
दयावति नमस्तुभ्यं विश्वेश्वरि नमोऽस्तु ते ।। 4।।
नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्यधारिणी ।
वसुवृष्टे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम् ।।5।।
रक्ष त्वं देवदेवेशि देवदेवस्य वल्लभे ।
दरिद्रात्त्राहि मां लक्ष्मि कृपां कुरु ममोपरि ।।6।।
नमस्त्रैलोक्यजननि नमस्त्रैलोक्यपावनि ।
ब्रह्मादयो नमस्ते त्वां जगदानन्ददायिनी ।।7।।
विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं जगद्धिते ।
आर्तिहन्त्रि नमस्तुभ्यं समृद्धि कुरु मे सदा ।। 8।।
अब्जवासे नमस्तुभ्यं चपलायै नमो नमः।
चंचलायै नमस्तुभ्यं ललितायै नमो नमः ।।9।।
नमः प्रद्युम्नजननि मातस्तुभ्यं नमो नमः।
परिपालय भो मातर्मा तुभ्यं शरणागतम्. ।।10।।
शरण्ये त्वां प्रपत्रोऽस्मि कमले कमलालये ।

त्राहि त्राहि महालक्ष्मि परित्राणपरायणे ।।11।।
पाण्डित्यं शोभते नैव न शोभन्ति गुणा नरे ।
शीलत्वं नैव शोभेत महालक्ष्मी त्वया विना ।।12।।
तावद्विराजते रुपं तावच्छीलं विराजते ।
तावद्रुणा नराणां च यावल्लक्ष्मीः प्रसीदति ।।13।।
लक्ष्मित्वयालंकृतमानवा ये पापैर्विमुक्ता नृपलोकमान्याः ।
गुणैर्विहीना गुणिनो भवन्ति दुःशीलिनः शीलवतां वरिष्ठाः ।।14।।
लक्ष्मीर्भूषयते रुपं लक्ष्मीर्भूषयते कुलम् ।
लक्ष्मीर्भूषयते विद्यां सर्वाल्लक्ष्मीर्विशिष्यते ।।15।।
लक्ष्मि त्वद्रुणकीर्तनेन कमलाभूर्यात्यलं जिह्मतां ।
रुद्राद्या रविचन्द्रदेवपतयो वक्तुं च नैव क्षमाः ।
अस्माभिस्तव रुपलक्षगुणान्वक्तुं कथं शक्यते ।
मातर्मा परिपाहि विश्वजननि कृत्वा ममेष्टं ध्रुवम् ।।16।।
दीनार्तिभीतं भवतापपीडितं धनैर्विहीनं तव पार्श्वमागतम् ।
कृपानिधित्वान्मम लक्ष्मि सत्वरं धनप्रदानाद्धननायकं कुरु ।।17।।
मां विलोक्य जननि हरिप्रिय निर्धनं तव समीपमागतम् ।
देहि में झटिति लक्ष्मि ।
कराग्रं वस्त्रकाञ्चनवरान्नमद् भुतम् ।।18।।
त्वमेव जननि लक्ष्मि पिता लक्ष्मी त्वमेव च ।।19।।
त्राहि त्रहि महालक्ष्मि त्राहि त्राहि सुरेश्वरी ।
त्राहि त्राहि जगन्मातर्दरिद्रात्त्राहि वेगतः ।।20।।
नमस्तुभ्यंजगद्धात्रि नमस्तुभ्यं नमो नमः ।
धर्माधारे नमस्तभ्यं नमः सम्पत्तिदायिनी ।।21।।
दरिद्रार्णवमग्नोऽहं निमग्नोऽहं रसातले ।
मज्जन्तं मां करे घृत्वा सूद्धर त्वं रमे द्रुतम् ।।22।।
किं लक्ष्मि बहुनोक्तेन जल्पितेन पुनः पुनः ।
अन्यन्मे शरणं नास्ति सत्यं सत्यं हरिप्रिय ।।23।।
एतच्छुत्वाऽगस्तिवाक्ययं हृष्यमाणा हरिप्रिया ।
उवाच मधुरां वाणी तुष्टाहं तव सर्वदा. ।।24।।

लक्ष्मीरुवाच ।

यत्त्वयोक्तमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति मानवः ।
श्रृणोति च महाभागस्तस्याहं वशवर्तिनी ।।25।।
नित्यं पठति यो भक्तया त्वलक्ष्मीस्तस्य नश्यति ।
रणश्रव नश्यते तीब्रं वियोगं नैव पश्यति ।।26।।
यः पठेत्प्रातरुत्थाय श्रद्धा-भक्तिसमन्वितः।
गृहे तस्य सदा स्थास्य नित्यं श्रीपतिना सह ।।27।।
सुखसौभाग्यसम्पन्नो मनस्वी बुद्धिमान् भवेत्.
पुत्रवान् गुणवान् श्रेष्ठो भोगभोक्ता च मानवः ।।28।।
इदं स्त्रोतं महापुण्यं लक्ष्म्यगस्तिप्रर्कीतितम् ।
विष्णुप्रसादजननं चतुर्वर्गफ़लप्रदम् ।।29।।
राजद्वारे जयश्रवैव शत्रोश्चैव पराजयः ।
भूतप्रेतपिचाशचानां व्याघ्राणां न भयं तथा ।।30।।
न शस्त्रानलतोयौघाद् भयं तस्य प्रजायते ।
दुर्वृत्तानां च पापानां बहुहानिकरं परम् ।।31।।
मदुराकरिशालासु गवां गोष्ठे समाहितः ।
पठेत्तद्दोषशान्त्यर्थ महापातकनाशनम् ।।32।।
सर्वसौख्यकरं नृणामायुरारोग्यदं तथा ।
अगस्त्रिमुनिना पोक्तं प्रजानां हितकाम्यया ।।33।।

। इत्यगस्तिविरचितं लक्ष्मीस्तोत्रं पूर्णम् ।

Wednesday, August 25, 2010

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SUNDERKAND
सुन्दरकाण्ड

श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
सुन्दरकाण्ड

श्लोक

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं .........

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LAXMI SUKTAM
लक्ष्मी सूक्तम्

पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्ममप्रिये पदमदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पाद्मं मयि सन्निधत्स्व ।। 1 ।।
पद्मानने पद्मउरु पद्माक्षी पदमसंभवे ।
तन्मे भजसि पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम् ।। 2 ।।
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने ।
धनं मे जुषतां देवी सर्वकामाश्च देहि मे ।। 3 ।।
पुत्रं पौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादि गवेरथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ।। 4 ।।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो वृहस्पतिर्वरुणो धनमस्तु मे ।। 5 ।।
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ।। 6 ।।
न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभामतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्री सूक्तजापिनाम् ।। 7 ।।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।। 8 ।।
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवी नमाम्यच्युतवल्लभाम् ।। 9 ।।
महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै ।
च धीमहि, तन्ने लक्ष्मीः प्रचोदयात् ।। 10 ।।
आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।
ऋषयश्च श्रियः पुत्राः मयि श्रीर्देविदेवता मताः।। 11 ।।
ऋणरोगादिदारिद्रय पापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्ताप नश्यन्तु मम सर्वदा ।। 12 ।।

श्री वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते ।
धान्यं धनं पशु बहुतपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः।। 13 ।।

इति ऋग्वेदोक्तं लक्ष्मी सूक्तम् समाप्त ।।

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PURUSH SUKTAM
पुरुष-सूक्तम्

ॐ सस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ।
स भूमि सँवर्त स्पृत्वात्त्यतिष्ठद्दशांगुलम् ।। 1 ।।
पुरुष एवेद सँर्व यसद्भूतं यच्च भाब्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिंरोहति ।।2।।
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।3।।
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ।।4।।
ततो विराडजायत विराजो अधि पुरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ।।5।।
तस्मादूयज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृपदाज्यम् ।
पशून्ताँश्चक्रेवा यव्यानारागयान्ग्राम्याश्च ये ।।6।।
तस्माद् यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ।।7।।
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माञ्जाता अजावयः ।।8।।
तं य्यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।

तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ।।9।।
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्यासीत् किम्बाहु किमरु पादाउच्येते ।।10।।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरुतदस्य यद् वैश्य पद्भ्यां शूद्रोअजायत ।।11।।
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्राद् वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ।।12।।
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्णों द्यौः समवर्त्तत ।
पद्भ्यांभूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथालोकाँऽअकल्पयन् ।।13।।
यत् पुरुषेणा हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इघ्म शरद्वविः ।।14।।
सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद् यज्ञ तन्वानाऽवघ्न् पुरुषम्पशुम् ।।15।।
यज्ञेन यज्ञ मयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
तेह नाके महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवा।।16।।
अद्भ्यः सम्भृतं पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणमं समवर्त्तताग्रे ।
त्स्य त्वष्टा विदधद् रुपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्त्वमाजानमग्रे ।।17।।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णन्तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।।18।।
प्रजाषतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।
तस्य योनिं परिपश्यन्ति घीरास्तस्मिन् हतस्थुर्भु वनानि विश्वा ।।19।।

यो देवेभ्य आतपति यो देवानां पुराहितः ।
पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्मये ।।20।।
रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा अग्रे तदब्रुबन् ।
यस्त्वैवं ब्राह्मणों विद्यातस्य देवा असन्वशे ।।21।।
श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पाश्वें
नक्षत्राणि रुपमश्विनौ व्यात्तम् ।
इष्णन्निषाणामुं म इषाण।
सर्वलोकं म इषाण ।। 22।।

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SRI SUKTAM
श्रीसूक्तम्.

ॐ हिरण्यवर्णा हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो मऽआवह।।1।।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्या हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ।।2।।
अश्वपूर्णा रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीजुषताम् ।।3।।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मस्थितां पद्मवर्णा तामिहो पह्वये श्रियम् ।।4।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वल्न्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनींमीं शरण प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।।5।।
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फ़लानि तपसानुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।।6।।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।।7।।
क्षुत्पिपासामलां जयेष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वा निणुद मे गृहात् ।।8।।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।।9।।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशुनां रुपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ।।10।।
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भवकर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्मालिनीम् ।।11।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
निच देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले ।।12।।
आर्द्रा पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्मालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो में आवह ।।13।।
आर्द्रा यः करिणीं यष्टिं सुवर्णा हेममालिनीम् ।
सूर्या हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ।।14।।
तां म ऽ आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्या हिरण्य प्रभूतं गावो दास्योऽश्वन्विन्देयं पुरुषानहम् ।।15।।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तमं पंचदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत् ।।16।।

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देवी नामावली-
विष्णु नामावली-
गणेश नामावली-
राम नामावली-
कृष्ण नामावली-
शिव नामावली-
हनुमान नामावली-

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SRI GANGA CHALISA
श्री गंगा चालीसा

दोहा जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग ।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग ॥

जय जग जननी हरण अघखानी। आनंद करनी गंग महारानी॥
जय भागीरथी सुरसरि माता। कलिमल मूल दलिनी विख्याता॥
जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जटा महं रह्यो समाई॥
वर्ष पर्यन्त गंग महारानी। रहीं शम्भु के जटा भुलानी॥
मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो। तब इक बूंद जटा से पायो॥
ताते मातु भई त्रय धारा। मृत्युलोक, नभ, अरु पातारा॥
गई पताल प्रभावति नामा। मंदाकिनी गई गगन ललामा॥
मृत्युलोक जाह्नवी सुहावनी। कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥
धनि मइया तब महिमा भारी। धर्म धुरी कलि कलुष कुठारी॥
मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी। धनि सुरसरितसकल भयनासिनी॥
पान करत निर्मल गंगा जल। पावत मन इच्छित अनन्त फल॥
पूरब जन्म पुण्य जब जागत। तबहिं ध्यान गंगा महं लागत॥
जइ पगु सुरसरि हेतु उठावहि। तइ जगि अश्वमेध फल पावहि॥
महापतित जिन काहू न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे॥
शत योजन हू से जो ध्यावहिं। निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं॥
नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥
जिमि धन मूल धर्म अरु दाना। धर्म मूल गंगाजल पाना॥
तव गुणगुणन करत दुःख भाजत। गृहगृह संपति सुमति विराजत॥
गंगहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूं सज्जन पद पावत॥
बुद्धिहीन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥
गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखे नंगे कबहुं न रहहीं॥
निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥
महा अघिन अधमन कहं तारे। भये नरक के बन्द किवारे॥
जो नर जपै गंग शत नामा। सकल सिद्ध पूरण ह्वै कामा॥
सब सुख भोग परम पद पावहिं। आवागमन रहित ह्वै जावहिं॥
धनी मइया सुरसरि सुख दैनी। धनी-धनी तीरथ राज त्रवेणी॥
ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा॥
जो यह पढ़े गंगा चालीसा। मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥
दोहा नित नव सुख संपति लहैं धरैं गंग का ध्यान।
अन्त समय सुरपुर बसैं सादर बैठि विमान॥
सम्वत भुज नभदिशि राम जन्म दिन चैत्र।
पूरण चालीसा किया हरि भक्तन हित नैत्र॥

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MAHA KALI CHALISA
महाकाली चालीसा

दोहा मात श्री महाकालिका ध्याऊँ शीश नवाय ।
जान मोहि निज दास सब दीजै काज बनाय ॥

नमो महा कालिका भवानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥
तुम्हारो यश तिहुँ लोकन छायो। सुर नर मुनिन सबन गुण गायो॥
परी गाढ़ देवन पर जब जब। कियो सहाय मात तुम तब तब॥
महाकालिका घोर स्वरूपा। सोहत श्यामल बदन अनूपा॥
जिभ्या लाल दन्त विकराला। तीन नेत्र गल मुण्डन माला॥
चार भुज शिव शोभित आसन। खड्ग खप्पर कीन्हें सब धारण॥
रहें योगिनी चौसठ संगा। दैत्यन के मद कीन्हा भंगा॥
चण्ड मुण्ड को पटक पछारा। पल में रक्तबीज को मारा॥
दियो सहजन दैत्यन को मारी। मच्यो मध्य रण हाहाकारी॥
कीन्हो है फिर क्रोध अपारा। बढ़ी अगारी करत संहारा॥
देख दशा सब सुर घबड़ाये। पास शम्भू के हैं फिर धाये॥
विनय करी शंकर की जा के। हाल युद्ध का दियो बता के॥
तब शिव दियो देह विस्तारी। गयो लेट आगे त्रिपुरारी॥
ज्यों ही काली बढ़ी अंगारी। खड़ा पैर उर दियो निहारी॥
देखा महादेव को जबही। जीभ काढ़ि लज्जित भई तबही॥
भई शान्ति चहुँ आनन्द छायो। नभ से सुरन सुमन बरसायो॥
जय जय जय ध्वनि भई आकाशा। सुर नर मुनि सब हुए हुलाशा॥
दुष्टन के तुम मारन कारन। कीन्हा चार रूप निज धारण॥
चण्डी दुर्गा काली माई। और महा काली कहलाई॥
पूजत तुमहि सकल संसारा। करत सदा डर ध्यान तुम्हारा॥
मैं शरणागत मात तिहारी। करौं आय अब मोहि सुखारी॥
सुमिरौ महा कालिका माई। होउ सहाय मात तुम आई॥
धरूँ ध्यान निश दिन तब माता। सकल दुःख मातु करहु निपाता॥
आओ मात न देर लगाओ। मम शत्रुघ्न को पकड़ नशाओ॥
सुनहु मात यह विनय हमारी। पूरण हो अभिलाषा सारी॥
मात करहु तुम रक्षा आके। मम शत्रुघ्न को देव मिटा को॥
निश वासर मैं तुम्हें मनाऊं। सदा तुम्हारे ही गुण गाउं॥
दया दृष्टि अब मोपर कीजै। रहूँ सुखी ये ही वर दीजै॥
नमो नमो निज काज सैवारनि। नमो नमो हे खलन विदारनि॥
नमो नमो जन बाधा हरनी। नमो नमो दुष्टन मद छरनी॥
नमो नमो जय काली महारानी। त्रिभुवन में नहिं तुम्हरी सानी॥
भक्तन पे हो मात दयाला। काटहु आय सकल भव जाला॥
मैं हूँ शरण तुम्हारी अम्बा। आवहू बेगि न करहु विलम्बा॥
मुझ पर होके मात दयाला। सब विधि कीजै मोहि निहाला॥
करे नित्य जो तुम्हरो पूजन। ताके काज होय सब पूरन॥
निर्धन हो जो बहु धन पावै। दुश्मन हो सो मित्र हो जावै॥
जिन घर हो भूत बैताला। भागि जाय घर से तत्काला॥
रहे नही फिर दुःख लवलेशा। मिट जाय जो होय कलेशा॥
जो कुछ इच्छा होवें मन में। संशय नहिं पूरन हो छण में॥
औरहु फल संसारिक जेते। तेरी कृपा मिलैं सब तेते॥

दोहा महाकलिका की पढ़ै नित चालीसा जोय।
मनवांछित फल पावहि गोविन्द जानौ सोय॥

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GAYATRI CHALISA
गायत्री चालीसा

दोहा ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड ।
शांति क्रांति जागृति प्रगति रचना शक्ति अखण्ड ॥
जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥
अक्षर चौबिस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥
शाश्वत सतोगुणी सतरूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा॥
हंसारूढ़ श्वेतांबर धारी। स्वर्ण कांति शुचि गगन बिहारी॥
पुस्तक पुष्प कमण्डल माला। शुभ्रवर्ण तनु नयन विशाला॥
ध्यान धरत पुलकित हिय होई। सुख उपजत दुःख दुरमति खोई॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥
तुम्हरी महिमा पार न पावै। जो शरद शतमुख गुण गावैं॥
चार वेद की मातु पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥
महामंत्र जितने जग माहीं। कोऊ गायत्री सम नाहीं॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥
महिमा अपरंपार तुम्हारी। जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जग में आना॥
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाए कछु रहै न क्लेशा॥
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥
तुम्हरी शक्ति दपै सब ठाई। माता तुम सब ठौर समाई॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी॥
जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई॥
मंद बुद्धि ते बुद्धि बल पावें। रोगी रोग रहित ह्वै जावें॥
दारिद मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा॥
ग्रह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी॥
सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख संपत्ति युत मोद मनावें॥
भूत पिशाच सब भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई॥
घर वर सुखप्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥
जयति जयति जगदंब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी॥
जो सद्गुरू सों दीक्षा पावें। सो साधन को सफल बनावें॥
सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी। लहैं मनोरथ गृही विरागी॥
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वांछित फल पावैं॥
बल बुद्धि विद्या शील स्वभाऊ। धन वैभव यश तेज उछाऊ॥
सकल बढ़ें उपजें सुख नाना। जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥

दोहा यह चालीसा भक्तियुक्त पाठ करें जो कोय।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय॥

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SRI LAXMI CHALISA
श्री लक्ष्मी चालीसा

॥ दोहा॥ मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥
॥ सोरठा॥ यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
॥ चौपाई ॥ सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥
ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥
॥ दोहा॥त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥॥.

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SRI KRISHAN CHALISA
श्री कृष्ण चालीसा

॥दोहा॥ बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
जय यदुनंदन जय जगवंदन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
दोहा यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥.

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SRI VINDHYESHWARI CHALISA
श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा

दोहा
नमो नमो विन्ध्येश्वरी नमो नमो जगदम्ब.
सन्तजनों के काज में करती नही विलम्ब.
चोपाई
जय जय जय विन्ध्याचल रानी. आदि शक्ति जग विदित भवानी.
सिंहवाहिनी जय जग माता. जय जय जय त्रिभुवन सुखदाता.
कष्ट निवारणी जय जग देवी. जय जय जय सन्त असुर सुर सेवी.
महिमा अमित अपार भवानी. शेश सहस मुख वर्णत हारी.
दीनन के दुःख हरत भवानी. नहिं देख्यो तुम सम कोई दानी.
सब पर मनसा पुरवत माता. महिमा अमित जगत विख्याता.
जो जन ध्यान तुम्हारो लावे. सो तुरतहिं वांछित फ़ल पावे.
तू ही वैश्णवी तू ही रुद्राणी, तू ही शारदा अरु ब्रह्माणी.
रमा राधिका श्यामा काली, तू ही मातु सन्तन प्रतिपाली.
उमा माधवी चन्ड़ी ज्वाला, बेगि मोहि पर होहु दयाला.
तू ही हिंगलाज महारानी, तू ही शीतला अरु विज्ञानी.
दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता, तू ही लक्ष्मी जग सुखदाता.
तू ही जाहनवी अरु उत्राणी. हेमावति अम्बा निर्वाणी.
अश्टभुजी वाराहिनी देवा. करत विष्णु शिव जाकर सेवा.
चौसठ देवी कल्यानी. गौरी मंगला सब गुणखानी.
पाटन मुक्ता दन्त कुमारी. भद्रकाली सुन विनय हमारी.
वज्रधारिणी शोक नाशिनी. आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी.
जया और विजया बैताली. मातु संकटी अरु विकराली.
नाम अनन्त तुम्हार भवानी. बरनै किमी मानुश अज्ञानी.
जा पर कृपा मातु तव होई. तो वह करै चहै मन जोई.
कृपा करहु मो पर महारानी. सिद्ध करिए अब म्म बानी.
जो नर धरै मातु पर ध्याना. ताकर सदा होए कल्याना.
विपति ताहि सपनेहु नहिं आवै. जो देवी का जाप करावै.
जो नर कहं ऋण होय आपारा. सो नर पाठ करै शत बारा.
निश्चय ऋण मोचन होई जाई.जो नर पाठ करै मन लाई.
अस्तुति जो नर पढ़ै पढ़ावै. या जग में सो अति सुख पावै
जा को व्याधि सतावै भाई. जाप करत सब दूर पराई.
जो नर अति बन्दी महं होई. बार हजार पाठ कर सोई.
निश्चय बन्दी ते छुटि जाई. सत्य वचन मम मानहु भाई.
जा पर जो कछु संकट होई. निश्चय देविहिं सुमिरै सोई.
जा कहँ पुत्र होय नहि भाई. सो नर या विधि करे उपाई.
पाँच वर्ष सो पाठ करावै. नौरातन में विप्र जिमावै.
निश्चय गोहिं प्रसन्न भवानी. पुत्र देहिं ताकहँ गुणखानी.
ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै. विधि समेत पूजन करवावै.
नित प्रति पाठ करै मन लाई, प्रेम सहित नहिं आन उपजाई.
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा. रंक पढ़त होवे अवनीसा.
यह जानि अचरज मानहुं भाई. कृपा दृष्टी जापर होई जाई.
जय जय जय जगमात भवानी. कृपा करहू मोहिं पर जन जानी.
जय जय जय जगमात भवानी. कृपा करहु मोहि पर जानी.

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SRI SARASWATI CHALISA
श्री सरस्वती चालीसा

जय श्रीसकल बुद्धि बलरासी. जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी.
जय जय जय वीणाकर धारी. करती सदा सुहंस सवारी.
रुप चतुर्भुज धारी माता. सकल विश्व अन्दर विख्याता.
जग में पाप बुद्धि जब होती. तबही धर्म की फ़ीकी ज्योति.
तबहि मातु का निज अवतारा. पाप हीन करती महितारा.
बाल्मिकि जी थे हत्यारा. तव प्रसाद जानै संसारा
रामचरित जो रचे बनाई. आदि कवि पदवी को पाई.
कालीदास जो भये विख्याता. तेरी कृपा दृष्टि से माता.
तुलसी सूर आदि विद्वाना. भये और जो ज्ञानी नाना.
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा. केवल कृपा आपकी अम्बा.
करहु कृपा सोई मातु भवानी. दुखित दीन निज दासहि जानी.
पुत्र करई अपराध बहूता. तेहि न धरई चित्त सुन्दर माता.
राखु लाज जननि अब मेरी. विनय करउ भाँति बहुतेरी.
मैं अनाथ तेरी अवलंबा. कृपा करहु जय जय जगदम्बा.
मधुकैटभ जो अति बलवाना. बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना.
समर हजार पांच में घोरा. फ़िर भी मुख उनसे नही मोरा.
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला. बुद्धि विपरीत भई खलहाला.
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी. पुरवहु मातु मनोरथ मेरी.
चंड मुंण्ड़ जो थे विख्याता. छण महु संहारेउ माता.
रक्त बीज से समरथ पापी. सुरमुनि हृदय धरा सब काँपी.
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा. बार बार बिनऊं जगदम्बा.
जग प्रसिद्धि जो शुंभ निशुंभा. क्षण में वधे ताहि तू अम्बा.
भरत-मातु बुद्धि फ़ेरेऊ जाई. रामचन्द्र वनवास कराई.
एहिविधि रावन वध तू कीन्हा. सुर नर मुनि सबको सुख दीन्हा.
को समरथ तव यश गुन गाना. निगम अनादि अनन्त बखाना.
विष्णु रुद्र अज सकहिन हमारी. जिनकी हो तुम रक्षाकारी.
रक्त दन्तिका और शताक्षी. नाम अपार है दानव भक्षी.
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा. दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा.
दुर्ग आदि हरनी तू माता. कृपा करहू जब जब सुखदाता.
नृप कोपित को मारन चाहै. कानन में घेरे मृग नाहै.
सागर मध्य पोत के भंजे. अति तुफ़ान नहिं कोऊ संगे.
भूत-प्रेत बाधा या दुःख में. हो दरिद्र अथवा संकट में.
नाम जपे मंगल सब होई. संशय इसमें करइ न कोई.
पुत्रहीन जो आतुर भाई. सबै छाँड़ि पूजें एहि माई.
करै पाठ नित यह चालीसा. होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा.
धूपादि नैवेद्य चढ़ावै. संकट रहित अवश्य हो जावै.
भक्ति मातु की करैं हमेशा. निकट न आवै ताहि कलेशा.
बंदी पाठ करें सत बारा. बंदी पाश दूर हो सारा.
रामसागर बाधि हेतु भवानी. कीजै कृपा दास निज जानी.

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SRI SANTOSHI MATA CHALISA
श्री सन्तोषी माता चालीसा

दोहा
श्री गणपति पद नाय सिर, धरि हिय शारदा ध्यान.
सन्तोषी माँ की करुँ, कीरति सकल बखान.
चौपाई
जय संतोषी माँ जग जननी, खल मति दुष्ट दैत्य दल हननी.
गणपति देव तुम्हारे ताता, रिद्धि-सिद्धि कहलावहं माता.
मात-पिता की रहो दुलारी, कीरति केहि विधि कहूँ तुम्हारी.
क्रीट मुकुट सिर अनुपम भारी, कानन कुण्डल की छवि न्यारी.
सोहत अंग छटा छवि प्यारी, सुन्दर चीर सुन्हरी धारी.
आप चतुर्भुज सुघड़ विशाला, धारण करहु गले वन माला.
निकट है गौ अमित दुलारी, करहु मयूर आप असवारी.
जानत सबही आप प्रभुताई, सुर नर मुनि सब करहिं बढ़ाई.
तुम्हरे दरश करत क्षण माई, दुख दरिद्र सब जाय नसाई.
वेद पुराण रहे यश गाई, करहु भक्त का आप सहाई.
ब्रह्मा ढ़िंग सरस्वती कहाई, लक्ष्मी रुप विष्णु ढ़िंग आई.
शिव ढ़िंग गिरिजा रुप बिराजी, महिमा तीनों लोक में गाजी.
शक्ति रुप प्रकट जग जानी, रुद्र रुप भई मात भवानी.
दुष्ट दलन हित प्रकटी काली, जगमग ज्योति प्रचंड निराली.
चण्ड मुण्ड महिशासुर मारे, शुम्भ निशुम्भ असुर हनि डारे.
महिमा वेद पुरानन बरनी, निज भक्त के संकट हरनी.
रुप शारदा हंस मोहिनी, निरंकार साकार दाहिनी.
प्रकटाई चहुंदिश निज माया, कण कण में है तेज समाया.
पृथ्वी सूर्य चन्द्र अरु तारे, तव इंगित क्रम बद्ध हैं सारे.
पालन पोषण तुम्ही करता, क्षण भंगुर में प्राण हरता.
बह्मा विष्णु तुम्हें निज ध्यावैं, शेश महेश सदा मन लावें.
मनोकामना पूरण करनी, पाप काटनी भव भय तरनी.
चित्त लगाय तुम्हें जो ध्याता, सो नर सुख सम्पत्ति है पाता.
बन्ध्या नारि तुमहिं जो ध्यावै, पुत्र पुष्प लता सम वह पावैं.
पति वियोगी अति व्याकुल नारी, तुम वियोग अति व्याकुलयारी.
कन्या जो कोई तुमको ध्यावैं, अपना मन वांछित वर पावै.
शीलवान गुणवान हो मैया, अपने जन की नाव खिवैया.
विधि पूर्वक व्रत जो कोई करहीं, ताहि अमित सुख सम्पत्ति भरहीं.
गुड़ और चना भोग तोहि भावै, सेवा करै सो आनन्द पावै.
श्रद्धा युक्त ध्यान जो धरहीं, सो नर निश्चय भव सों तरहीं.
उद्यापन जो करहि तुम्हारा, ताको सहज करहु निस्तारा.
नारि सुहागिन व्रत जो करती, सुख सम्पत्ति सों गोद भरती.
जो सुमिरत जैसी मन भावा, सो नर वैसो फ़ल पावा.
सोलह शुक्र जो व्रत मन धारे, ताके पूर्ण मनोरथ सारे.
सेवा करहि भक्ति युक्त जोई, ताको दूर दरिद्र दुख होई.
जो जन शरण माता तेरी आवै, ताकै क्षण में काज बनावै.
जय जय जय अम्बे कल्याणी, कृपा करौ मोरी महारानी.
जो यह पढ़ै मात चालीसा, तापे करहिं कृपा जगदीशा.
निज प्रति पाठ करै इक बारा, सो नर रहै तुहारा प्यारा.
नाम लेत ब्याधा सब भागे, रोग दोश कबहूँ नही लागे.
दोहा
सन्तोषी माँ के सदा बन्दहुँ पग निश वास.
पुर्ण मनोरथ हों सकल मात हरौ भव त्रास.

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SHREE RAM CHALISA
श्री राम चालीसा

श्री रघुवीर भक्त हितकारी. सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी.
निशि दिन ध्यान ध्यान धरै जो कोई. ता सम भक्त और नहिं होई.
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं. ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं.
जय जय जय रघुनाथ कृपाला. सदा करो सन्तन प्रतिपाला.
दूत तुम्हार वीर हनुमाना. जासु प्राभाव तिहूँ पुर जाना.
तव भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला. रावण मारि सुरन प्रतिपाला.
तुम अनाथ के नाथ गोसाई. दीनन के हो सदा सहाई.
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं. सदा ईश तुम्हरो यश गावैं.
चारिउ वेद भरत हैं साखी. तुम भक्तन की लाज राखी.
गुण गावत शारद मन माहीं. सुरपति ताको पार न पाहीं.
नाम तुम्हार लेत जो कोई. ता सम धन्य और नहिं होई.
राम नाम है अपरम्पारा. चारिहु वेदन जाहि पुकारा.
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों. तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हौ.
शेष रटत नित नाम तुम्हारा. महि को भार शीश पर धारा.
फ़ूल समान रहत सो भारा. पाव न कोउ तुम्हारो पारा.
भरत नाम जो तुम्हरो उर धारो. तासों कबहु न रण में हारो.
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा. सुमिरत होत शत्रु कर नाशा.
लक्ष्मन तुम्हारे आज्ञाकारी. सदा करत सन्तन रखवारी.
ताते रण जीते नहीं कोई. युद्ध जुरे यहहूं किन होई.
महालक्ष्मी घर अवतारा. सब विधि करत पाप को छारा.
सीता नाम पुनीता गायो. भुवनेश्वरी प्रभाव दिखयो.
घट सों प्रकट भई सो आई. जाको देखत चन्द्र लजाई.
सो तुम्हरे नित पाँव पलोटत. नवों निद्धि चरणन में लोटत.
सिद्धि अठारह मंगलकारी. सो तुम पर जावै बलिहारी.
औरहु जो अनेक प्रभुताई. सो सीतापति तुमहिं बनाई.
इच्छा ते कोटिन संसारा. रचत न लागत पल की वारा.
जो तुम्हारे चरणन चित्त लावै. ताको मुक्ति अवसि हो जावै.
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा. निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा.
सत्य सत्य सत्यव्रत स्वामी. सत्य सनातन अन्तर्यामी.
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै. सो निश्चय चारों फ़ल पावै.
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं. तुमने भक्तिहिं सब सिद्धि दीन्हीं.
सुनहु रामतुम तात हमारे. तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे.
तुमहिं देव कुल देव हमारे. तुम गुरु देव प्राण प्यारे
जो कुछ हो सो तुम ही राजा. जय जय जय प्रभु राखो लाजा
राम आत्मा पोषण हारे. जय जय जय दशरथ के दुलारे
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा. नमो नमो जय जय जगपति भूपा
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा. नाम तुम्हार हरत संतापा
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया. बजी दुन्दुभी शंख बजाया
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन. तुमही हो हमारे तन मन धन
याको पाठ करे जो कोई. ज्ञान प्रकट ताके उर होई
आवागमन मिटै तिहि केरा. सत्य वचन माने शिव मेरा
और आस मन में जो होई. मनवांछित फ़ल पावे सोई
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावैं. तुलसी दल अरु फ़ूल चढ़ावै
साग पत्र सो भोग लगावैं. सो नर सकल सिद्धाता पावैं
अन्त समय रघुवर पुर जाई. जहां जन्म हरि भक्त कहाई
श्री हरिदास कहै अरु गावै. सो बैकुण्ठ धाम को जावै

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SRI DURGA CHALISA
श्री दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी. नमो नमो अम्बे दुःख हरनी.
निरंकार है ज्योति तुम्हारी. तिहूँ लोक फ़ैली उजियारी.
शशी ललाट मुख महा विशाला. नेत्र लाल भृकुटी विकराला.
रुप मातु को अधिक सुहावे. दरश करत जन अति सुख पावे.
तुम संसार शक्ति लय कीना. पालन हेतु अन्न धन धन दीना.
अन्न्पूर्णा हुई जग पाला. तुम ही आदि सुन्दरी बाला.
प्रलयकाल सब नाशन हारी. तुम गौरी शिव शंकर प्यारी.
शिव योगी तुम्हारे गुण गावे. ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें.
रुप सरस्वती का तुम धारा. दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा.
धरा रुप नरसिंह को अम्बा. प्रकट भई फ़ाड़ कर खम्बा.
रक्षा कर प्रहलाद बचायो. हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो.
लक्ष्मी रुप धरो जग माहीं. श्री नारायण अंग समाहीं.
क्षीरसिन्धु में करत विलासा. दया सिन्धु दीजै मन आसा.
हिंगलाज में तुम्ही भवानी, महिमा अमित न जात बखानी.
मातंगी धूमावती माता. भूवनेश्वरी बगला सुखदाता.
श्री भैरव तारा जग तारणि. छिन्नभाल भव दुःख निवारिणी.
केहरि वाहन सोहे भवानी. लांगुर बीर चलत अगवानी.
कर में खप्पर खड़्ग विराजै. जाको देख काल डर भाजै.
सोहे अस्त्र और त्रिशूला. जाते उठत शत्रु हिय शूला.
नगर कोटि में तुम्ही विराजत. तिहूँ लोक में डंका बाजत.
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे, रक्त बीज शंखन संहारे.
महिशासुर नृप अति अभिमानी. जेही अध भार मही अकुलानी.
रुप कराल कालिका धारा. सेन सहित तुम तिहि संहारा.
परी गाढ़ संतन पर जब जब, भई सहाय मातु तुम तब तब.
अमर पुरी अरु बासव लोका. तव महिमा सब कहे अशोका.
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी. तुम्हें सदा पूजें नर नारी.
प्रेम भक्ति से जो यश गावें. दुःख दरिद्र निकट नही आवे.
जोगी सुर नर कहत पुकारी. योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी.
शंकर आचारज तप कीनो. काम अरु क्रोध जीति सब लीनो.
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को. काहु काल नहिं सुमिरो तुमको.
शक्ति रुप को मरम न पायो. शक्ति गई तब मन पछतायो.
शरणागत हुई कीर्ति बखानी. जय जय जय जगदम्ब भवानी.
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा. दई शक्ति नहिं कीन बिलम्बा.
मोको मात कश्ट अति घेरो. तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो.
आशा तृश्णा निपट सतावे. रिपु मूरख मोहि अति डर पावै.
शत्रु नाश कीजै महारानी. सुमिरौं एकचित तुम्हें भवानी.
करो कृपा हे मातु दयाला. ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला.
जब लगि जियौ दया फ़ल पाऊं, तुम्हरे यश में सदा सुनाऊं.
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै. सब सुख भोग परम पद पावै.
देवीदास शरण निज जानी. करहु कृपा जगदम्ब भवानी.

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SRI SHANI CHALISA
श्री शनि चालीसा

जय गनेश गिरिजा सुवन. मंगल करण कृपाल.
दीनन के दुःख दूर करि. कीजै नाथ निहाल.
जय जय श्री शनिदेव प्रभु. सुनहु विनय महाराज.
करहु कृपा हे रवि तनय. राखहु जन की लाज.
जयति जयति शनिदेव दयाला. करत सदा भक्तन प्रतिपाला.
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै. माथे रतन मुकुट छवि छाजै.
परम विशाल मनोहर भाला. टेढ़ी दृश्टि भृकुटि विकराला.
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके. हिये माल मुक्तन मणि दमके.
कर में गदा त्रिशूल कूठारा. पल बिच करैं अरिहिं संसारा.
पिंगल, कृश्णों, छाया, नन्दन. यम कोणस्थ, रौद्र, दुःखभंजन.
सौरी, मन्द, शनि, दशनामा. भानु पुत्र पूजहिं सब कामा.
जापर प्रभु प्रसन्न हो जाहीं. रंकहुं राव करै क्षण माहीं.
पर्वतहु तृण होई निहारत. तृणहु को पर्वत करि डारत.
राज मिलत बन रामहिं दीन्हा. कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हा.
बनहूँ में मृग कपट दिखाई. मातु जानकी गई चुराई.
लक्षमन विकल शक्ति के मारे. रामा दल चनंतित बहे सारे
रावण की मति गई बौराई. रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई.
दियो छारि करि कंचन लंका. बाजो बजरंग वीर की डंका.

नृप विकृम पर दशा जो आई. चित्र मयूर हार सो ठाई.
हार नौलख की लाग्यो चोरी. हाथ पैर डरवायो तोरी.
अतिनिन्दा मय बिता जीवन. तेलिहि सेवा लायो निरपटन.
विनय राग दीपक महँ कीन्हो. तव प्रसन्न प्रभु सुख दीन्हो.
हरिश्चन्द्र नृप नारी बिकाई. राजा भरे डोम घर पानी.
वक्र दृश्टि जब नल पर आई. भूंजी- मीन जल बैठी दाई.
श्री शंकर के गृह जब जाई. जग जननि को भसम कराई.
तनिक विलोकत करि कुछ रीसा. नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा.
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी. अपमानित भई द्रौपदी नारी.
कौरव कुल की गति मति हारि. युद्ध महाभारत भयो भारी.
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला. कुदि परयो ससा पाताला.
शेश देव तब विनती किन्ही. मुख बाहर रवि को कर दीन्ही.
वाहन प्रभु के सात सुजाना. जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना.
कौरव कुल की गति मति हारि. युद्ध महाभारत भयो भारी.
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला. कुदि परयो ससा पाताला.
शेश देव तब विनती किन्ही. मुख बाहर रवि को कर दीन्ही.
वाहन प्रभु के सात सुजाना. जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना.
जम्बुक सिंह आदि नख धारी सो फ़ल जयोतिश कहत पुकारी.
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवै.हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं.
गदर्भ हानि करै बहु काजा. सिंह सिद्ध कर राज समाजा.
जम्बुक बुद्धि नश्ट कर डारै . मृग दे कश्ट प्राण संहारै.
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी. चोरी आदि होय डर भारी.
तैसहि चारि चरण यह नामा. स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा.
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं. धन जन सम्पति नश्ट करावै.
समता ताम्र रजत शुभकारी. स्वर्ण सदा सुख मंगल कारी.
जो यह शनि चरित्र नित गावै. दशा निकृश्ट न कबहुं सतावै.
नाथ दिखावै अदभुत लीला. निबल करे जय है बल शिला.
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई. विधिवत शनि ग्रह शांति कराई.
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत. दीप दान दै बहु सुख पावत.
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा. शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा.
दोहा
पाठ शनिचर देव को, कीन्हों विमल तैयार.
करत पाठ चालीसा दिन, हो दुख सागर पार.

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SHIV CHALISA
शिव चालीसा

दोहा
जय गणेश गिरिजासुवन, मंगल मूल सुजान
कहत अयोध्यादास तुम, देउ अभय वरदान
चौपाई
जय गिरिजापति दीनदयाला,सदा करत सन्तन प्रतिपाला.
भाल चन्द्रमा सोहत नीके. कानन कुण्डल नागफ़णी के.
अंग गौर सिर गंग बहाये. मुण्माल तन क्षार लगाये.
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे. छवि को देखि नाग मुनि मोहे.
मैंना मातु कि हवे दुलारी. वाम अंग सोहत छवि न्यारी.
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी, करत सदा शत्रुन क्षयकारी.
नन्दि गणेश सोहे तहं कैसे, सागर मध्य कमल हैं जैसे.
कार्तिक श्याम और गणराऊ. या छवि को जात न काऊ.
देवन जबहिं जाय पुकारा. तबहिं दुख प्रभु आप निवारा.
किया उपद्रव तारक भारी. देवन सब मिलि तुमहिं जुगारी.
तुरत शडानन आप पठायउ. लव निमेश महं मारि गिरायउ.
आप जलंधर असुर संहारा. सुयश तुम्हार विदित संसारा.
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई. सबहिं कृपा कर लीन बचाई.

किया तपहिं भारी. पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी.
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं. अकथ अनादि भेद नही पाई.
पकटी उदधि मंथन में ज्वाला. जरे सुरासुर भए विहाला.
कीन्ह दया तहँ करी सहाई. नीलकंठ तब नाम कहाई.
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा. जीत के लंक विभीशण दीन्हा.
सहस कमल में हो रहे धारी. कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी.
एक कमल प्रभु राखेउ जोई. कमल नैन पूजन चहुं सोई.
कठिन भक्ती देखी प्रभु शंकर. भए प्रसन्न दिए इच्छित वर.
जय जय अनन्त अविनाशी. करत कृपा सबके घट वासी.
दुष्ट सकल नित मोहि सतावैं. भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै.
त्राहि-त्राहि मैं नाथ पुकारो. येही अवसर मोहि आन उबारो.
ले त्रिशूल शत्रुन को मारो. संकट से मोहि आन उबारो.
मातु-पिता भ्राता सब कोई. संकट में पूछत नही कोई.
स्वामी एक है आस तुम्हारी. आय हरहु अब संकट भारी.
धन निर्धन को देत सदा ही.जो कोई जांचे वो फ़ल पाहीं.
अस्तुति केहि विधि करुँ तुम्हारी. क्षमहु नाथ अब चूक हमारी
शंकर हो संकट के नाशन. मंगल कारण विघ्न विनाशन.
योगी यती मुनि ध्यान लगावैं. नारद शारद शीश नवावैं.

नमो नमो जय नमः शिवाये. सुर ब्रह्मादिक पार न पाये.
जो यह पाठ करे मन लाई. तापर होत है शम्भु सहाई.
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी. पाठ करे सो पावन हारी.
पुत्रहीन कर इच्छा जोई. निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई.
पण्डित त्रयोदशी को लावे. ध्यानपूर्वक होम करावे.
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे, शंकर सन्मुख पाठ सुनावे.
जन्म-जन्म के पाप नसावे.अन्त वास शिवपुर में पावे.
कहै अयोध्या आस तुम्हारी. जानि सकल दुख हरहु हमारी.
दोहा
नित्य नेम कर प्रातः ही, पाठ करो चालीस
तुम मेरी मनोकमना, पूर्ण करो जगदीश
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण

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SRI HANUMAN CHALISA
श्री हनुमान चालीसा

दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुर सुधारि.
बरनउँ रघबर बिमल जसु जो दायकु फ़ल चारि.
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार.
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस विकार.
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर.
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनी-पुत्र पवन सुत नामा.
महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी.
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुंडक कुंचित केसा.
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै, काँधे मूँज जनेऊ साजै.
संकर सुमन केसरीनंदन, तेज प्रताप महा जग बंदन.
बिद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर.
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया.
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा.
भीम रुप धरि असुर सँहारे, रामचन्द्र के काज सँवारे.
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुबीर हराषि उर लाये.
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई.
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं.
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा.
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते.
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राज पद दीन्हा.
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना.
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू , लील्यो ताहि मधुर फ़ल जानू.
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं.
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते.
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसरे.
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रच्छक काहू को डर ना.
आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै.
भूत पिचास निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै.
नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा.
संकट से हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै.
सब पर राम तपस्वी राजा, तिन के काज सकल तुम साजा.
और मनोरथ जो कोई लावै, सोइ अमित जीवन फ़ल पावै.
चारों जुग प्रताप तुम्हारा, हे प्रसिद्ध जगत उजियारा.
साधु संत के तुम रखवारे, ससुर निकंदन राम दुलारे.
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता.
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के पासा.
तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावे.
अंत काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई.
और देवता चित्त न धरई, हनुमत से सब सुख करई.
संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमंत बलबीरा.
जै जै जै हनुमान गोसाई, कृपा करहु गुरु देव की नाई.
जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई.
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा.
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ ह्र्दय महँ डेरा.
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप
राम लखन सीता सहित, ह्रदय बसहु सुर भूप

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GANESH CHALISA
श्री गणेश चालीसा

दोहा
जय गणपति सदगुणसदन. करिवर बदन कृपाल.
विघ्न हरण मंगल करण. जय जय गिरिजा लाल.
चौपाई
जय जय जय गणपति गण राजू. मंगल भरण करण शुभ काजू.
जय गजबदन सुखदाता. विश्व विनायक बुद्धि विधाता.
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन. तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन.
राजत मणि मुक्तन उर माला. स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला.
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशुलं. मोदक भोग सुगंधित फ़ूलं.
सुन्दर पिताम्बर तन साजित. चरण पादुका मुनि मन राजित.
धनि शिवसुवन शडानन भ्राता. गौरी ललन विश्व विख्याता.
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे. मूशक वाहन सोहत द्वारे.
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी. अति शुचि पावन मंगलकारी.
एक समय गिरिराज कुमारी. पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी.
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा. तब पहुंच्यो तुम धरि द्धिज रुपा.
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी. बहुविधि सेवा करी तुम्हारी.
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा. मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा.
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला. बिना गर्भ धारण, यहि काला.
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना. पूजित प्रथम, रुप भगवाना.
अस कहि अन्तर्धान रुप हवै. पलना पर बालक स्वरुप हवै.
बनि शिशु , रुदन जबहिं तुम ठान. लखि मुख नहिं गौरि समाना.
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं. नभ ते सुरन सुमन वर्शावाहिं.
शम्भु , उमा , बहु दान लुटावहिं. सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं.
लखि अति आनन्द मंगल साजा. देखन भी आये शनि राजा.
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं. बालक, देखन चाहत नाहीं.
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो. उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो.
कहन लगे शनि, मन सकुचाई. का करि हौ, शिशु मोहि दिखाई.
नहिं विश्वास , उमा उर भयौऊ. शनि सो बालक देखन कहयऊ.
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा. बालक सिर उड़ि गयो अकाशा
गिरिजा गिरीं विकल हवै धरणी. सो दुख दशा गयो नंहि वरणी.
हाहाकार मच्यो कैलाशा. शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा.
तुरत गरुड़ विष्णु सिधाय. काटि चक्र सों गज शिर लाये.
बालक के धड़ ऊपर धारयो. प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो.
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे. प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे.
बुद्धि परिक्षा जब शिव कीन्हा. पृथ्वी पर प्रदक्षिणा लीन्हा.
चले शडानन भरमि भुलाई. रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई.
चरण मातु-पितु के घर लीन्हें. तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें.
धनि गणेश कहि शिव हिय हरशे. नभ ते सुरन सुमन बह बरसे.
तुम्हारी महिमा बद्धि बड़ाई. शेश सहस मुख सके न गाई.
मैं मति हीन मलीन दुखारी. करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी.
भजत राम सुन्दर प्रभुदासा. लग, प्रयाग, ककरा दुर्वासा.
अब प्रभु दया दीन पर कीजै. अपनी शक्ती भक्ति कुछ दीजै.
दोहा
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करें धर ध्यान.
नित नव मंगल गृह बसै, लगे जगत सन्मान.
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋशि पंचमी दिनेश.
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश.

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SHRI PRETRAJ SARKAR AARTI

श्री प्रेतराज सरकार आरती

जय प्रेतराज कृपालु मेरी, अरज अब सुन लीजिये ।
मैं शरण तुम्हारी आ गया हूँ, नाथ दर्शन दीजिये ।
मैं करूं विनती आपसे अब, तुम दयामय चित धरो ।
चरणों का ले लिया आसरा, प्रभु वेग से मेरा दुःख हरो ।
सिर पर मोर मुकुट करमें धनुष, गलबीच मोतियन माल है ।
जो करे दर्शन प्रेम से सब, कटत तन के जाल हैं ।
जब पहन बख्तर ले खड़ग, बांई बगल में ढाल है ।
ऐसा भयंकर रूप जिनका, देख डरपत काल है ।
अति प्रबल सेना विकट योद्धा, संग में विकराल हैं ।
तब भुत प्रेत पिषाच बांधे, कैद करते हाल हैं ।
तब रूप धरते वीर का, करते तैयारी चलन की ।
संग में लड़ाके ज्वान जिनकी, थाह नहीं है बलन की ।
तुम सब तरह समर्थ हो, प्रभुसकल सुख के धाम हो ।
दुष्टों के मारनहार हो, भक्तों के पूरण काम हो ।
मैं हूं मती का मन्द मेरी, बुद्धि को निर्मल करो ।
अज्ञान का अन्धेर उर में, ज्ञान का दीपक धरो ।
सब मनोरथ सिद्ध करते, जो कोई सेवा करे ।
तन्दुल बूरा घृत मेवा, भेंट ले आगे धरे ।
सुयश सुन कर आपका, दुखिया तो आये दूर के ।
सब स्त्री अरू पुरूष आकर, पड़े हैं चरण हजूर के ।
लीला है अद्भुत आपकी, महिमा तो अपरंपार है ।
मैं ध्यान जिस दम धरत हूँ , रच देना मंगलाचार है ।
सेवक गणेशपुरी महन्त जी , की लाज तुम्हारे हाथ है ।
करना खता सब माफ , उनकी देना हरदम साथ है ।
दरबार में आओ अभी , सरकार में हाजिर खड़ा ।
इन्साफ मेरा अब करो , चरणों में आकर गिर पड़ा ।
अर्जी बमूजिब दे चुका , अब गौर इस पर कीजिये ।
तत्काल इस पर हुक्म लिख दो , फैसला कर दीजिए ।
महाराज की यह स्तुति , कोई नेम से गाया करे ।
सब सिद्ध कारज होय उनके , रोग पीड़ा सब टरे ।
‘‘सुखराम ’’ सेवक आपका, उसको नहीं बिसराइये ।
जै जै मनाऊं आपकी , बेड़े को पार लगाइये ।

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YAMUNA JI KI AARTI

यमुना जी की आरती

ऊँ जै यमुना माता , हरि ऊँ जै यमुना माता , नो नहावे फल पावे सुख सुख की दाता ।
ऊँ जै यमुना माता..............................
पवन श्री यमुना जल शीतल अगम बहै धारा , जो जन शरण से कर दिया निस्तारा ।
ऊँ जै यमुना माता..............................
जो जन प्रातः ही उठकर नित्य स्नान करे , यम के त्रास न पावे जो नित्य ध्यान करे ।
ऊँ जै यमुना माता..............................
कलिकाल में महिमा तुम्हारी अटल रही , तुम्हारा बड़ा महातम चारों वेद कही ।
ऊँ जै यमुना माता..............................
आन तुम्हारे माता प्रभु अवतार लियो , नित्य निर्मल जल पीकर कंस को मार दियो ।
ऊँ जै यमुना माता..............................
नमो मात भय हरणी शुभ मंगल करणी , मन ‘बेचैन ’ भया है तुम बिन वैतरणी ।
ऊँ जै यमुना माता..............................

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SHRI RADHA JI AARTI

श्री राधाजी की आरती

आरती श्री वृषभानुसुता की।
मन्जु मूर्ति मोहन ममता की। आरती ..
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,
विमल विवेक विराग विकासिनि,
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,
सुन्दरतम छवि सुन्दतरा की॥ आरती ..
मुनि मनमोहन मोहन मोहनि,
मधुर मनोहर मूरति सोहनि,
अविरल प्रेम अमित रस दोहनि,
प्रिय अति सदा सखी ललिता की॥ आरती ..
संतत सेव्य संत मुनिजन की,
आकर अमित दिव्यगुन गन की,
आकर्षिणी कृष्ण तन मन की,
अति अमूल्य सम्पति समता की॥ आरती ..
कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि,
चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि,
जगजननि जग दु:ख निवारिणि,
आदि अनादि शक्ति विभुता की॥ आरती ..