श्रीजगन्नाथ रथयात्रा
पुरी का अद्भुत, अनुपम,चन्द्रछटा लिये मनोरम समुद्री किनारा । जहाँ बसते है श्री भगवान जगन्नाथ ।
आषाढ़ माह के मध्य मे उड़ीसा (पुरी) के जगन्नाथ मन्दिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियों से सुसज्जित रथयात्रा निकाली जाती है। इसे हम जगन्नाथ रथयात्रा के नाम से जानते हैं। सबसे आगे बलराम का रथ होता है, जिसे नीले रंग के वस्त्रों से सजाया जाता है। बीच मे सुभद्रा के साथ सुदर्शन चक्र होता है, जिसे काले वस्त्रों से सजाया जाता है। सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है, जिसे पीले वस्त्रों से सजाया जाता है। इस रथयात्रा के दर्शन हेतु हजारो लाखों की संख्या में बच्चे, युवा, वृद्ध आते हैं।
तीनों रथ संध्या तक गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं। दूसरे दिन सुबह-सुबह तीनों मूर्तियों को रथ से उतार कर मंदिर में ले जाया जाता है। सात दिन तक भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा यहीं रहते हैं। यहां सातों दिन इन मूर्तियों की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है। इन सात दिनों में श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हैं। जिसे आड़प दर्शन कहा जाता है।
आषाढ शुक्ल पक्ष दशमी के दिन उन्हें फिर से रथों पर बैठाया जाता है। इसके बाद वे अपने मूल मंदिर में वापिस आ जाते हैं। यह वापसी यात्रा बाहुडा के नाम से लोकप्रिय है। जिन श्रद्धालुओं को रथ की रस्सी पकड़कर खींचने का सौभाग्य नहीं मिल पाता, वे रथ यात्रा के दर्शन मात्र से ही पुण्य पा जाते हैं।
जगन्नाथ यात्रा के पीछे मान्यता है कि एक बार देवी सुभद्रा अपनी ससुराल से द्वारिका आई थीं। उन्होंने अपने दोनों भाइयों से नगर-दर्शन की इच्छा व्यक्त की। बलराम और श्रीकृष्ण ने उन्हें एक रथ पर बैठा दिया। दोनों भाई भी अलग-अलग रथों पर सवार हो गए। सुभद्रा के रथ को बीच में रखा गया और तीनों चल पड़े द्वारिकापुरी दर्शन के लिए। इसी के बाद से ही रथयात्रा निकाली जाने लगी।
शास्त्रों और पुराणों में भी इस रथ यात्रा का उल्लेख मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो व्यक्ति रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम, और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुए करते हैं। वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
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