श्रीगुरु हरगोबिन्द सिंह जयन्ती
शान्ति भक्ति एवं धर्म प्रचारक "श्रीगुरु हरगोबिन्द सिंह" सिख छठें गुरू थे । गुरु हरगोबिन्द साहिब की शिक्षा दीक्षा महान् विद्वान् भाई गुरदास की देख-रेख में हुई। श्रीगुरु हरगोबिन्दसाहिब ने शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की। वह महान योद्धा भी थे। विभिन्न प्रकार के शस्त्र चलाने का उन्हें अद्भुत अभ्यास था।
मुगलों के अत्याचार का उन्होनें खुलकर विरोध किया। गुरु हरगोबिन्द साहिब का चिन्तन भी क्रान्तिकारी था। वह चाहते थे कि सिख कौम शान्ति, भक्ति एवं धर्म के साथ-साथ अत्याचार एवं जुल्म का मुकाबला करने के लिए भी सशक्त बने। साहिब के सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्द साहिब की दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है।
गुरु जी ने शाहजहां के साथ चार बार टक्कर ली। उनके पास इतनी बडी सैन्य शक्ति थी कि मुगल सिपाही हमेशा भयभीत रहते थे। गुरु जी ने मुगल सेना को कई बार पराजय दी। गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अपने व्यक्तित्व और बहादुरी से ऐसी अदम्य लहर पैदा की, जिसने आगे चलकर सिख संगत में भक्ति और शक्ति की नई चेतना पैदा की। गुरु हरगोबिन्द साहिब का सिख लहर को प्रभावशाली बनाने में अद्वितीय योगदान रहा है।
गुरु जी ने अपनी सूझ-बूझ से श्रद्धालुओं को सुगठित भी किया और सिख-समाज को नई दिशा भी प्रदान की। अकाल तख्त साहिब सिख समाज के लिए ऐसी सर्वोच्च संस्था के रूप में उभरा, जिसने भविष्य में सिख शक्ति को केन्द्रित किया तथा उसे अलग सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान प्रदान की। इसका श्रेय गुरु हरगोबिन्द साहिब को ही जाता है।
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