Wednesday, August 25, 2010

Totalbhakti

पद्मा एकादशी

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गं ।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिध्यार्नगम्यं
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मा एकादशी कहते हैं। इस दिन आषाढ़ मास से शेष शैय्या पर निद्रामग्न भगवान विष्णु शयन करते हुए करवट बदलते हैं। इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। इस एकादशी को भगवान के वामन अवतार का व्रत व पूजन किया जाता है। इस व्रत को करने से सभी प्रकार के मनोरथ सिद्ध होते हैं।

माना जाता है इस एकादशी को जो मनुष्य कमलनयन भगवान का कमल द्वारा पूजन करता है। मानो ब्रह्मा विष्णु सहित तीनों लोकों को उसने पूज लिया। इस दिन लक्ष्मी जी का भी पूजन करना काफ़ी फ़लदायी होता है, क्योंकि देवताओं ने अपना राज्य को दुबारा पाने के लिए महालक्ष्मी का ही पूजन किया था।

इस दिन प्रातः स्नान आदि करने के बाद भगवान वामनजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। मत्स्य, कूर्म, वाराह, आदि नामों का उच्चारण करते हुए धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि से विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। दिनभर उपवास रखें और रात्रि में भगवान का भजन करें। दूसरे दिन दुबारा उसी प्रकार पूजन करें। ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान दें, उसके बाद स्वयं भोजन करके व्रत समाप्त करें।

महाभारत काल में जब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से इस व्रत के महात्म्य के बारे में पूछा, तो श्री कृष्ण ने बताया -हे युधिष्ठिर ! त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया। देवताओं के आग्रह पर मैने वामन रुप धारण कर दैत्यराज बलि से देवताओं को मुक्ति तथा बलि को पाताल लोक का राजा बनाया था। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी वामन रुप में पूजा करता है, उसके सभी पाप समाप्त हो जाते है। वह सभी सुखों को भोग स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है।

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