योगिनी एकादशी
आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष पर पड़ने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं। यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध तथा समस्त पापों को नष्ट करने वाली है। इस दिन भगवान विष्णु अथवा उनके लक्ष्मी नारायण रुप की आराधना करनी चाहिये। भगवान की मूर्ति को स्नान कराके स्वच्छ वस्त्रों से सजाना चाहिए। धूपदीप, नैवेद्य आदि से भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिये। पूजा व आरती के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराके दान आदि देना चाहिए।
महाभारत काल में युधिष्ठिर ने कृष्ण से इस लोक में भोग तथा परलोक में मुक्ति देने वाली योगिनी एकादशी व्रत की माहात्म्य के बारे में पूछा। कृष्ण ने युधिष्ठिर को इस योगिनी एकादशी व्रत के बारे में बताया !
प्राचीन काल में अलकापुरी नामक नगरी में राजा कुबेर के यहाँ हेम नामक एक माली रहता था। उसका कार्य प्रतिदिन भगवान शंकर की पूजा के लिये मानसरोवर से फूल लाना था। एक दिन वह अपनी पत्नी के साथ हास्य-विनोद करने के कारण फूल ले जाना भूल गया। राजा कुबेर ने सिपाहियों से माली को पकड़ कर लाने को कहा। सेवकों ने वापिस आ राजा को बताया कि वह अपनी पत्नी के साथ हास्य-विनोद कर रहा था। इससे क्रोधित होकर कुबेर ने उसे स्त्री वियोग और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होने का श्राप दे दिया। शाप से कोढ़ी होकर हेम माली इधर-उधर भटकता हुआ एक दिन मार्कण्डेय ॠषि के आश्रम में जा पहुँचा। ॠषि ने अपने योगबल से उसके दुखी होने का कारण जान लिया। तब उन्होंने उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। व्रत के प्रभाव से हेम माली का कोढ़ समाप्त हो गया और वह दिव्य शरीर धारण कर स्वर्गलोक वापिस चला गया ।
भगवान कृष्ण ने बताया इस कथा को पढ़ने-सुनने व विधि पूर्वक करने से, मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
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