Wednesday, August 25, 2010

Totalbhakti

सूर्य पूजन

। ऐहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ।।

‘सूर्य देव' सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का एकमात्र कारण। सम्पूर्ण जगत की आत्मा हैं भगवान सूर्य। सारे जगत के कर्ता धर्ता सर्वकल्याणकारी साक्षात् ब्रह्ममय है। इन्होंने ही लोकों का उत्पादन और पालन किया है। सबके रक्षक होने के कारण इनकी समानता करने वाला दूसरा कोई नही है। दिन भर सारे जगत् में प्रकाश और आनन्द बिखेरकर संध्यावेला में अस्ताचल की ओर जाने वाले भगवान भास्कर का सौन्दर्य अद्भुत है।

भगवान सूर्य के अर्घ्यदान की विशेष महत्ता है। माना जाता है सूर्य को अर्ध्य देने के बाद ही दैव कार्य या पितृ कार्य पूर्ण हो पाते हैं। योगासनों में भी सूर्य नमस्कार को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। शास्त्रों व पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करता है, वह हजार जन्मों में भी दरिद्र नही होता है।

प्रतिदिन प्रात: काल ताम्रपात्र में जल, लाल चन्दन, चावल, पुष्प और कुशादि रखकर सूर्यमन्त्र का जप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिये। सूर्यार्घ्य का मन्त्र ॐ एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते, अनुकम्पय मां देवी गृहाणार्घ्यं दिवाकर है। अर्घ्यदान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य आयु, आरोग्य, धन-धान्य, यश, विद्या, सौभाग्य, मुक्ति सब कुछ प्रदान करते हैं।

No comments:

Post a Comment