रमा एकादशी
कार्तिक कृष्ण पक्ष पर पड़ने वाली एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। दीपावली से चार दिन पहले पड़ने वाली इस एकादशी को लक्ष्मी जी के नाम पर रमा एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पूर्णावतार कृष्ण जी के केशव रुप की आराधना की जाती है।
इस दिन प्रातः स्नानादि करने के बाद भगवान केशव का धूप, दीप, फ़ल, फ़ूल, नैवेद्य आदि से पूजन व आरती करनी चाहिए। नैवेद्य आदि का वितरण कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरे दिन ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करते रहें। रात भर जागरण करें। अगले दिन प्रातः स्नानादि करने के बाद फ़िर भगवान केशव की आराधना करें। यथाशक्ति ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर विदा करें। इस प्रकार विधि पूर्वक रमा एकादशी का व्रत करने से मनुष्यों का कल्याण होता है।
महाभारत काल में जब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से इस व्रत के महात्म्य के बारे में पूछा, तो कृष्ण ने बताया - हे युधिष्ठिर ! प्राचीन काल में मुचुकुन्द नाम का राजा बड़ा सत्यवादी तथा विष्णु भक्त था। उसकी पुत्री चन्द्रभागा का विवाह सोभन नामक राजकुमार से हुआ। राजा मुचुकुन्द एकादशी व्रत बड़े नियम से किया करते थे। उनके राज्य में सभी इस कठोरता से इस नियम का पालन किया करते थे। एक बार सोभन दशमी के दिन अपनी ससुराल आया। उस दिन पूरे नगर में संदेश भिजवा दिया गया कि एकादशी के दिन कोई भोजन न करे। इस कारण सोभन ने भी इस व्रत को किया। लेकिन वह भूख सह न सका, और सुबह होते-होते उसके प्राण पखेरु उड़ गये। रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन मन्दराचल के शिखर पर बसे हुए अति सुन्दर देवपुर को प्राप्त हुआ। सोभन ने यह व्रत श्रद्धाहीन होकर किया था। इसलिए यह नगरी स्थाई नही थी। एक ब्राह्मण द्वारा राजा मुचुकुन्द को सोभन के बारे में पता चला। राजा द्वारा बताने पर चन्द्रभागा ब्राह्मण के साथ मन्दराचल पर्वत के निकट वामदेव मुनि के आश्रम में गई। वहा ऋषि के मन्त्र की शक्ति तथा एकादशी व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा का शरीर दिव्य हो गया। इसके बाद वह पति के समीप गई। चन्द्रभागा ने 8 वर्ष की अवस्था से ही श्रद्धापूर्वक रमा एकादशी का व्रत किया था। जिसके प्रभाव दे यह नगर स्थिर हो गया। रमा व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा अपने पति के साथ मन्दराचल के शिखर पर आनन्दपूर्वक रहने लगी।
माना जाता है श्रद्धापूर्वक या विवश होकर भी जो मनुष्य इस रमा एकादशी व्रत को करता है। वह उत्तम फ़ल प्राप्त करता है।
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