पुत्रदा एकादशी
श्रावण शुक्ल एकादशी पर पड़ने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। यह व्रत पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस व्रत में भगवान श्रीविष्णु की पूजा व आराधना का विधान है। इस दिन प्रातः स्नानादि करने के बाद भगवान श्रीविष्णु का धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करना चाहिए। भगवान को नैवेद्य में नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा नींबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा आम के फलों से देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए ।
इस दिन भगवान विष्णु का ही स्मरण करते रहना चाहिए। रात्रि में भी भगवान का जागरण करते रहना चाहिए। रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास ही सोने का विधान है। अगले दिन ज्ञानी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। इस व्रत को रखने वाले नि:संतान व्यक्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति अवश्य होती है।
महाभारतकाल में जब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से इस एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में पूछा तो श्रीकृष्ण बोले - हे अर्जुन !
द्वापर युग के आरम्भ में महिष्मति नामक नगरी में महिजीत नामक राजा राज्य करता था। लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नही लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो , उसके लिए यह लोक और परलोक दोनो ही दुख दायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए, किन्तु राजा को पुत्र की प्राप्ति नही हुई। राजा इसी प्रकार दिन रात चिन्ता में लगा रहता था। एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया। वन में राजा ने सरोवर के पास कुछ मुनियों को देखा। राजा ने घोड़े से उतरकर मुनियों को दंड़वत प्रणाम किया। मुनियों ने प्रसन्न हो राजा से इच्छा जाननी चाही। राजा बोले यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे एक पुत्र का वरदान दीजिए। मुनि बोले- राजन्! पुत्रदा एकादशी का व्रत करो भगवान की कृपा से आपके घर पुत्र होगा।
मुनि के वचनों को सुन राजा ने इस एकादशी व्रत को श्रद्धापूर्वक किया। जिससे उन्हें शूरवीर और यशस्वी पुत्र प्राप्त हुआ।
इस पुत्रदा एकादशी व्रत के पुण्य से मनुष्य पुत्रवान, तपस्वी, विद्वान और धनवान होता है।
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